तेरा चेहरा

જૂન 30, 2007

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं
तेरे आगे चांद पुराना लगता हैं

तिरछे तिरछे तीर नजर के चलते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता हैं

आग का क्या हैं पल दो पल में लगती हैं
बुझते बुझते एक ज़माना लगता हैं

सच तो ये हैं फूल का दिल भी छल्ली हैं
हसता चेहरा एक बहाना लगता हैं


रहता है

જૂન 30, 2007

सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
इश्क में और कुछ नहीं होता
आदमी बावरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
एक पल देख लूँ
एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
जल गया सब जरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
चाँद जब आसमाँ पे आ जाए
आप का आसरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है
सहमा सहमा डरा सा रहता है


बात निकलेगी तो

જૂન 30, 2007

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशां क्यूं हो
उँगलियाँ उठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ
चूड़ियों पर भी कई तन्ज़ किये जायेंगे
कांपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जायेंगे
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों मे मेरा ज़िक्र भी ले आयेंगे
उनकी बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तासुर से समझ जायेंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी


पीते हैं

જૂન 30, 2007

नज़र नज़र से मिलाकर शराब पीते हैं
हम उनको पास बिठाकर शराब पीते हैं।

इसीलिए तो अँधेरा है मैकदे में बहुत
यहाँ घरों को जलाकर शराब पीते हैं।

हमें तुम्हारे सिवा कुछ नज़र नहीं आता
तुम्हें नज़र में सजा कर शराब पीते हैं।

उन्हीं के हिस्से आती है प्यास ही अक्सर
जो दूसरों को पिला कर शराब पीते हैं।


रखना

જૂન 30, 2007

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना

यूं उजालों से वास्ता रखना
शमा के पास ही हवा रखना

घर की तामिर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की कुछ जगह रखना

मिलना जुलना जहा ज़रूरी हो
मिलने ज़ुलने का हौसला रखना


अपने होठों पर

જૂન 30, 2007

अपने होठों पर सजाना चाहता हूं
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं

कोई आसू तेरे दामन पर गिराकर
बूंद को मोती बनाना चाहता हूं

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूं

छा रहा हैं सारी बस्ती में अंधेरा
रोशनी को घर जलाना चाहता हूं

आखरी हिचकी तेरे शानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूं


ઉંમર

જૂન 30, 2007

હવે ક્યાં આપણી કોઇ ફિકર કરવાની ઉંમર છે ?
ગળે રૂમાલ બાંધી ફાંકડા ફરવાની ઉંમર છે.

ન આપું કેમ ઝૂકીને સલામી ખૂબસૂરતને ?
હવે તિતલીના રંગોની ઉપર મરવાની ઉંમર છે !

ગુલાલ ઊડી રહ્યો છે લોહીમાં શરણાઇ વાગે છે,
નવું કૈં આપણા જીવતરમાં અવતરવાની ઉંમર છે.

ભલે ક્યારેક સંકેલાઇ રહેવાની હતી ઉંમર,
હવે છુટ્ટા મૂકેલા સઢમાં ફરફરવાની ઉંમર છે.

હવે તો હુંય ખુલ્લો થઇ ગયો છું આભની જેવો,
હવે તો બાથ ખુલ્લી પૃથ્વીને ભરવાની ઉંમર છે !